क्या हुआ
भारत के स्वास्थ्य व्यवस्था ने अपनी विशाल और विविध जनसंख्या के लिए उच्च गुणवत्ता सेवाएं प्रदान करने में चुनौतियों से जूझ रहा है, इसीलिए स्वास्थ्य समूहों ने देश की आवश्यक दवाओं की सूची के तत्काल परिवर्तन की मांग कर रहे हैं। वर्तमान सूची, जिसका आखिरी अपडेट 2015 में हुआ, अति अल्प है, जिससे लाखों मरीजों को जीवन-रक्षा चिकित्साओं से वंचित होने को मजबूर हैं।
स्वास्थ्य प्रतिनिधि ने भारत की आवश्यक स्वास्थ्य सेवा में तत्काल परिवर्तन की मांग की
भारत के स्वास्थ्य सेवा प्रणाली की स्थिति को एक सिर्फ हाल ही में एक रिपोर्ट द्वारा प्रकाशित किया गया, जिसमें विश्व स्वास्थ्य संगठन (WHO) ने भारत के स्वास्थ्य सेवा प्रणाली की कड़े स्थिति को उजागर किया. रिपोर्ट के अनुसार, भारत में स्वास्थ्य सेवा की आवश्यक दवाएं में से लगभग 70% दवाएं देश के सूचीबद्ध आवश्यक दवाओं से बाहर हैं, जिससे मरीजों को कैंसर, डायबेट्स, और कार्डियोवस्कुलर रोग के इलाज का मौका नहीं मिलता. यह विशेषतः चिंताजनक है, जबकि इन स्थितियों की संख्या भारत में बढ़ रही है क्योंकि शहरीकरण और जीवन शैली के परिवर्तन के कारण.
हम एक महत्वपूर्ण फासला देख रहे हैं कि जो चाहिए और जो उपलब्ध है, उसके बीच में," डॉ. सौम्या स्वामीनाथन ने, स्वास्थ्य और परिवार कल्याण मंत्रालय की सचिव कहा. "वर्तमान आवश्यक दवाओं की सूची भारत के बदलावशील रोग पृष्ठभूमि से नहीं मिल रही, और यह रोगियों को जोखिम में डाल रहा है." भारत के आवश्यक दवाओं की सूची के लिए तुरंत कार्रवाई की मांग बढ़ रही है, स्वास्थ्य समूहों ने तत्काल कार्रवाई की मांग की है.
स्वास्थ्य के प्रतिनिधि तत्काल भारत की आवश्यक सेवाओं में सुधार की मांग कर रहे हैं
प्रभावों का न होना गंभीर है. जिनके लिए जीवन-रक्षा चिकित्सा की आवश्यकता है, उन्हें विकल्प नहीं मिलेगा, जिसके परिणाम सuffering और मौत होगी. इसके अलावा, आवश्यक दवाओं की उपलब्धता का अभाव भी समाज के broader प्रभावों को लेकर है, क्योंकि रोगियों को अनौपचारिक बाज़ार या अनुभवहीन चिकित्सकों से इलाज के लिए मजबूर होना पड़ेगा.
यह एक बहुत ही महत्वपूर्ण मामला नहीं है केवल व्यक्तिगत रोगियों के लिए बल्कि संपूर्ण स्वास्थ्य सेवा के लिए भी, कहा डॉ. कीर्ति सिंह, इंडियन मेडिकल एसोसिएशन की अध्यक्ष। " अगर हम इस मुद्दे पर ध्यान नहीं देते, तो इससे स्वास्थ्य सेवा के समस्याएं और बढ़ाने लगेंगी।" भारत के आवश्यक दवाओं की सूची की संपूर्ण समीक्षा की जरूरत है।
विशेषज्ञ दृष्टिकोण
स्वास्थ्य प्रतिनिधि की तत्काल संशोधन की मांग
भारत के आवश्यक दवाओं की सूची पर बहस गरम है, दो विशेषज्ञों ने अलग-अलग स्वास्थ्य क्षेत्र के कोनों से अपना मत जताया है कि यह संशोधन रोगियों और प्रदाताओं के लिए क्या मतलब है। डॉ. रुक्मिणी राव, एक प्रमुख सार्वजनिक स्वास्थ्य विशेषज्ञ और अखिल भारतीय आयुर्विज्ञान संस्थान (AIIMS) की प्रोफेसर, तर्क देते हैं कि एक अपडेटेड सूचा लंबे समय से अधिक आवश्यक है।
स्वास्थ्य प्रतिनिधि ने भारत की आवश्यक सुधार के लिए तत्काल संशोधन का आह्वान किया
राजू डॉक्टर ने कहा, "वर्तमान सूची 20 वर्ष पहले तैयार की गई थी." तब से, नई दवाएं उत्पन्न हुईं और बीमारियों का हमारा समझ विकसित हुआ. इसका मतलब है कि हमें प्रमाण-आधारित निर्णय लेने की आवश्यकता है, ताकि रोगियों को सबसे अच्छा संभव देखभाल मिल सके।
जिसके विपरीत, विवेक जैन डॉक्टर, भारत की सबसे बड़ी जनरल ड्रग निर्माता के सीईओ और फार्मास्यूटिकल इंडस्ट्री के एक प्रसिद्ध विशेषज्ञ, अधिक सावधान हैं।
हालांकि एक संशोधन की आवश्यकता है, हमें सावधान रहने की ज़रूरत है कि हम कुछ अतिरिक्त बाधाएं न बना लें, या लागत में वृद्धि न करें। रोगियों के需求 और उद्योग प्रतिभागियों के साथ संतुलित दृष्टिकोण आवश्यक है। इन विशेषज्ञों के दृष्टिकोण इस मुद्दे की जटिलता को उजागर करते हैं।
क्या अगला है
स्वास्थ्य समूहों की मांग परिवर्तन के लिए जारी है
स्वास्थ्य समूहों ने एक पुनर्समीक्षा के लिए दबाव डाला है, कई महत्वपूर्ण तिथियां दृश्यमान हैं। 2023 के पहले तिमाही के अंत तक, भारत सरकार एक संशोधित मसविदा सूची जारी करने की उम्मीद है, जिसके बाद यह जनता के लिए टिप्पणी के लिए खुला होगा। इसके बाद एक लंबे समीक्षा प्रक्रिया शुरू होगी, जो 2024 के मध्य तक स/stretch सकती है।
स्वास्थ्य प्रतिनिधि आवश्यक संशोधन के लिए भारत की आवश्यक दवाएं की त्वरित समीक्षा की मांग करते हैं
आगामी सप्ताह और महीनों में, पाठकों को उम्मीद है कि व्यापक बहस की संभावना होगी, साथ ही उद्योग खिलाड़ियों और मरीज अधिवक्ता समूहों से बढ़ती निगरानी होगी। भारत के चुनाव 2024 के लिए निर्धारित हैं, इसलिए यह मुद्दा राजनीतिक विमर्श में कैसे शामिल होगा, अभी पता नहीं है। भारत की आवश्यक दवाएं का भविष्य अज्ञात है।
भारत की आवश्यक दवाओं की सूची में सुधार का समय आ गया है
भारत के स्वास्थ्य सेवा प्रणाली को समय के पीछे नहीं रहना चाहिए; इसको आधुनिक, सबूत-आधारित निर्णय लेने की आवश्यकता है, जिसमें रोगियों की पहली प्राथमिकता हो। आने वाले महीनों में, भारत की आवश्यक दवाओं के सुधार की मांग सुर्खियों में रहेगी – और ठीक है।
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